'विश्व-हिंदी'
के साथ-साथ 'विश्व-नागरी' भी
चले
विश्व बहुत नजदीक आ गया है।
छोटा हो गया है। संस्कृत
में हमेशा हम कहते हैं-
वसुधैव कुटुम्बकम्। मैंने
यह कई दफे समझाया है कि 'कुटुम्ब'
और 'कुटुम्बकम्' में अंतर
है। 'कुटुम्बकम्' यानी छोटा
सा कुटुम्ब। पूरे सौर-मंडल
में वसुधा का एक छोटा सा
कुटुम्ब है। सृष्टि में कई
लाख ग्रह हैं। परमात्मा की
सृष्टि अनंत है। उनमें एक
पृथ्वी है। इसलिए वह हमारा
छोटा सा कुटुम्ब है। हम तो
विश्व व्यापक हैं। हमारा
कुटुम्ब दूर तक फैला है।
चंद्र, मंगल, सब हमारे
कुटुम्ब में आते हैं।
पृथ्वी हमारा छोटा सा
कुटुम्ब है- इतनी व्यापक
दृष्टि हमारे पूर्वजों की
थी। वेद में शब्द आया है- 'विश्वमानुष'
अर्थात् 'मैं विश्व मानव
हूं।'
आज के इस विज्ञान (साइंस) के
जमाने में सारे विश्व को एक
छोटा सा कुटुम्ब मानकर
चलना पड़ेगा। इसलिए 'बाबा'
एक ओर ग्रामदान बोलता है और
दूसरी ओर 'जय जगत्'। 'जय भारत'
और 'जय हिन्द' अब पुराने पड़
गए हैं। विज्ञान के कारण अब
सारे विश्व को एक होना
पड़ेगा। संपूर्ण विश्व के
साथ संबंध रखना पड़ेगा।
विज्ञान और आत्मज्ञान का
संबंध घनिष्ठ होना चाहिए।
जैसे मोटर में दो यंत्र
होते हैं- एक गति बढ़ाने या
कम करने वाला और दूसरा दिशा
दिखानेवाला, मोटर के लिए
दोनों की आवश्यकता है। तो
हमारे लिए गति देने वाला
यंत्रहै- विज्ञान, और दिशा
दिखाने वाला है- आत्मज्ञान-
अध्यात्म (spirituality)। आने वाले
युग में दो शक्तियां काम
करेंगी। इनमें मैंने एक
शक्ति और जोड़ दी है।
बाबा का श्लोक है-
वेदान्तो विज्ञानः
विश्वासश्चेति शक्तयः
तिस्त्रः
यासां स्थैर्ये शांति
समृद्धि भविष्यति जगति।
विश्वास तीसरी शक्ति है।
विश्वास की शक्ति अहिंसा
जैसी है। जो हिंसा करेगा
उसे हम अहिंसा से जीतेंगे।
उसी प्रकार अविश्वास को
विश्वास से जीतना है।
सामनेवालाहम पर जितना
अविश्वास करेगा, हम उस पर
उतना अधिक विश्वास
करेंगे। वह हमें कतल करने
को तैयार हो जाए, तो उससे
कहना चाहिए- मैं तुम्हारी
गोद में सो जाऊंगा, ताकि
तुम्हें कतल करने के लिए
दूर न जाना पड़े। मैं मर
जाऊंगा तो भी मैं अपना
विश्वास नहीं छोड़ूंगा।
तात्पर्य यह है कि तीनों
शक्तियों का विकास होगा, तब
दुनिया में शांति होगी-
एकता होगी।
हिंदी
विश्व हिंदी सम्मेलन हो
रहा है- यह बड़ी प्रसन्नता
की बात है।
यूनो (UN) में स्पेनिश को
स्थान है, अगरचे स्पेनिश
बोलने वाले 15-16 करोड़ ही
हैं। हिन्दी का यूनो में
स्थान नहीं है, यद्यपि उसके
बोलनेवालों की संख्या
लगभग 26 करोड़ है।
(इसका कारण यह है कि
बिहारवालों ने अपनी भाषा
सेंसस में मैथिली, भोजपुरी
लिखी है। राजस्थानवालों
ने अपनी भाषा राजस्थानी
बनाई है। इन कारणों से
हिंदी बोलने वालों की
संख्या 15 करोड़ रह गई। अगर
हम इन सबकी गिनती करते तो
हिन्दी बोलने वालों की
संख्या कम से कम 22 करोड़
होती। इसके अलावा उर्दू भी
एक प्रकार से हिंदी ही है,
जिसे बोलने-वालों की
संख्या करीब चार करोड़ है)।
इंग्लिश बोलनेवालों की
संख्या 30 करोड़ है। चीनी
भाषा 70 करोड़ लोग बोलते हैं-
ऐसा यूनो में लिखा गया है।
सत्तर करोड़ की वह भाषा
मानी जाती है। यह उनकी (चीनी
बोलनेवालों की) कुशलता है।
चीन में कम से कम 30-40 भाषाएं
हैं। परंतु उन सबकी लिपि
चित्रलिपि है। उसके साढ़े
तीन-चार हजार चित्र हैं। उन
चित्रों के अनुसार वे अपनी-अपनी
भाषा पढ़ लेते हैं। कोई भी
समझ सकता है कि इतने लंबे-चौड़े
प्रदेश में एक भाषा हो ही
नहीं सकती।
इसका अर्थ यह हुआ कि दुनिया
में बोलनेवाले लोगों की
संख्या की दृष्टि से नंबर
एक हैं- इंग्लिश बोलनेवाले
और नंबर दो हैं- हिंदी
बोलनेवाले।
देवनागरी
'विश्व-हिंदी' के साथ-साथ 'विश्व-नागरी'
भी चले। इस काम में देर
करने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ लोगों का विचार है कि
इस दिशा में हमको धीरे-धीरे
आगे बढ़ना होगा, जिससे कुछ
भय मालूम न हो। मैं ऐसा
नहीं मानता। देवनागरी
लिपि, हिंदी की ही लिपि न
मानी जाए। वह 'संस्कृत लिपि'
है- ऐसा माना जाए। संस्कृत,
मराठी, हिंदी, पालि, मागधी,
अर्धमागधी, नेपाली- इन सभी
भाषाओं की लिपि देवनागरी
है। जब संस्कृत विश्व-भाषा
बनने की योग्यता रखती है,
तो उसकी लिपि देवनागरी को 'विश्व-नागरी'
के रूप में फैलाने में किसी
बाधा का भय क्यों होना
चाहिए? विश्व की तमाम
भाषाएं यदि देवनागरी अथवा
विश्व-नागरी लिपि में भी
लिखी जाने लगें, तो 'वसुधैव
कुटुम्बकम्' का स्वप्न
शीघ्र साकार होगा।
संस्कृत भाषा के लगभग 3000
शब्द इंग्लिश में कुछ बदले
हुए रूप में विद्यमान हैं।
मदर (माता), फादर (पिता),
ब्रदर (भ्रातृ), नोज (नासा)
आदि। नी (जानु)- 'नी' में 'के'
का उच्चार नहीं होता।
वास्तव में वह 'क्नी' है।
अंग्रेजी के अनेक शब्द
धातु संस्कृत से बने हैं।
जापानी भाषा में भी लगभग
300-350 संस्कृत शब्द मुझे मिले
हैं। अपने कोश में मैंने उन
पर चिन्ह लगा दिया है। अन्य
कई भाषाओं में भी संस्कृत
शब्दों की कमी नहीं है।
इसलिए जब हम हिंदी को 'विश्व
हिंदी' बनाने की कल्पना
करते हैं, तब देवनागरी लिपि
को भी 'विश्व नागरी' बनाने
की बात सोचना उचित ही माना
जाएगा।
(विनोबाजी ने प्रथम विश्व
हिंदी सम्मेलन के लिए यह
संदेश भेजा था। वे उस जमाने
में भी आज के विज्ञान-निर्मित
'विश्व ग्राम' की तर्ज पर
सोचा करते थे। 'विश्व नागरी'
विनोबाजी के विचार भी बहुत
महत्वपूर्ण हैं)।
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